शिवपूजा की कुछ विशेषताएं एवं उनका अध्यात्मशास्त्रीय आधार

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शिवपूजा में शंख की पूजा

शिवपूजा में शंख की पूजा नहीं की जाती, उसी प्रकार शिवजी पर शंखद्वारा जल नहीं डालते । देवताओं की मूर्तियों के मध्य में यदि पंचायतन (पंचायतन अर्थात पंच देवता – नारायण (श्रीविष्णु), गणपति, शिव, देवी एवं रवि (सूर्य)) की स्थापना हो, तो उसके बाणलिंग पर शंखद्वारा जल डाल सकते हैं;  परंतु महादेव की पिंडी के बाणलिंग को शंख के जल से स्नान नहीं करवाते ।

अध्यात्मशास्त्रीय आधार : शिवपिंडी में अरघा के रूप में स्त्रीकारकत्व होता है, इसलिए स्त्रीकारकत्व युक्त शंख का जल पुनः डालने की आवश्यकता नहीं होती । बाणलिंग के साथ अरघा नहीं होती, इस कारण उसे शंख के जल से स्नान करवाते हैं ।

महादेव की पूजा करते समय शंखपूजा का विधान

मंदिर में महादेव की पूजा करते समय शंखपूजा का विधान नहीं है । केवल आरतीपूर्व शंखनाद का विधान है, इसलिए आरती के समय शंखनाद अवश्य किया जाता है ।

अध्यात्मशास्त्रीय आधार : शंखनाद से प्राणायाम का अभ्यास तो सिद्ध होता है ही, साथ ही शंखनाद की ध्वनि जहांतक गूंजती है, वहांतक भूतबाधा, जादू-टोना आदि अनिष्ट शक्तियों से कष्ट नहीं होता है ।

शिवजी पर तुलसी नहीं चढाते

शिवजी पर तुलसी नहीं चढाते हैं,  परंतु शालग्राम शिला पर अथवा विष्णुमूर्ति पर चढाई गई तुलसी उन पर चढा सकते हैं ।

अध्यात्मशास्त्रीय आधार : इसका कारण यह है कि शिवजी श्रीविष्णुभक्त हैं; इसलिए श्रीविष्णु पर चढाई गई तुलसी उन्हें प्रिय है ।

नीले पुष्पों से पूजा

आषाढ कृष्ण पक्ष अष्टमी के दिन शंकरजी की एवं चतुर्दशी को रेवती की पूजा नीले पुष्पों से करनी चाहिए । शिवजी को केवडे की बालियां महाशिवरात्रि व्रत के उद्यापन के समय ही चढाते हैं ।

अध्यात्मशास्त्रीय आधार : कालानुसार पूजासामग्री में होनेवाले परिवर्तन का यह एक उदाहरण है । उदा. ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष अष्टमी के दिन नीले रंग के फूलमें, हरे बेल के समान, शिवतत्त्व ग्रहण करने की क्षमता होती है । इसलिए इस दिन शिव को नीले रंग के फूल चढाने चाहिए ।

शिवपिंडी पर अर्पित किए गए बेल एवं श्वेत पुष्प तथा भोगप्रसाद ग्रहण करना वर्जित है

अध्यात्मशास्त्रीय आधार : शिवजी वैराग्य के देवता हैं । शिवजी को अर्पित की गई वस्तु यदि सर्वसाधारण व्यक्ति ग्रहण करे, तो उसमें वैराग्य निर्माण हो सकता है । सहसा सर्वसाधारण व्यक्ति को वैराग्य की इच्छा नहीं होती । इसलिए शिवपिंडी पर अर्पित वस्तु को अग्राह्य माना जाता है । ५० प्रतिशत से अधिक आध्यात्मिक स्तर के व्यक्ति के लिए यह नियम लागू नहीं होता; स्तर अधिक होने के कारण उस पर वैराग्यदायक तरंगों का परिणाम नहीं हो सकता । ऐसा इसलिए क्योंकि, उसके मन में माया से दूर जाने के विचार आरंभ हो चुके होते हैं । साथ ही, ५० प्रतिशत से अधिक आध्यात्मिक स्तर का व्यक्ति अधिकांशतः स्थूल कर्मकांड के परे जा चुका होता है; उसकी मानस-उपासना आरंभ हो चुकी होती है । ऐसे व्यक्ति के मन में ऐसे कर्मकांडजन्य विचार आने की संभावना अल्प होती है कि, शिवजी को अर्पित वस्तु ग्रहण करनी चाहिए ।

शैव, कापालिक, गोसावी, वीरशैव इत्यादि अपने-अपने संप्रदायानुसार पार्थिवलिंग, कंठस्थ (गले में पहनने हेतु चांदी की पेटी में) लिंग, स्फटिकलिंग, बाणलिंग, पंचसूत्री, पाषाणलिंग, इस प्रकार के लिंग शिवपूजा हेतु प्रयोग किए जाते हैं ।

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